जब रिकॉर्डिंग खत्म होती है, कैमरे बंद हो जाते हैं और स्टूडियो में सन्नाटा छा जाता है, लेकिन दिमाग के अंदर एक फिल्म चलने लगती है। डीओपी करणदीप सिंह के साथ डेढ़ घंटे की बातचीत के बाद भी यही हुआ। यह कोई इंटरव्यू नहीं था, यह Haryanvi Industry Reality को समझने की एक ईमानदार कोशिश थी — बिना चमक, बिना पीआर और बिना झूठे सपनों के।
Haryanvi Industry Reality: जो दिखता है, वो पूरा सच नहीं है
आज हरियाणवी म्यूजिक इंडस्ट्री बाहर से बहुत बड़ी और चमकदार दिखती है। मिलियन व्यूज़, ट्रेंडिंग गाने, महंगी गाड़ियां और सोशल मीडिया का शोर। लेकिन कैमरे के पीछे खड़े लोग एक अलग कहानी बताते हैं। डीओपी, एडिटर, लाइटमैन, प्रोडक्शन टीम — ये वो चेहरे हैं जिनके बिना कोई गाना नहीं बनता, लेकिन जिनका नाम शायद ही कोई याद रखता है। यही इस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी विडंबना है।
एक पत्रकार की नजर से: डीओपी के साथ बिताया गया समय
हम अक्सर गाने या फिल्म देखते वक्त सिंगर, एक्टर या डायरेक्टर की बात करते हैं। लेकिन करणदीप जैसे लोग याद दिलाते हैं कि विज़ुअल की आत्मा डीओपी के हाथ में होती है। उन्होंने एक बात बहुत सादगी से कही — “कैमरा बाद में देखता है, पहले आंख देखती है।” यहीं से फर्क पैदा होता है। यह सिर्फ टेक्निकल स्किल की बात नहीं है। यह सोच की बात है। Haryanvi Industry Reality को define करती है। आज इंडस्ट्री में कैमरे तो महंगे हैं, लेकिन देखने वाली आंखें कम होती जा रही हैं।
हरियाणवी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी लड़ाई
एक लाइन जो दिमाग में अटक गई: करणदीप ने बहुत साफ कहा: “जुगाड़ लोहे और लकड़ी में चलता है, फिल्मों में नहीं।” यह बात सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है। यह पूरे क्रिएटिव सिस्टम पर लागू होती है। कम बजट कोई समस्या नहीं है, समस्या है clear vision की कमी। आज भी कई प्रोजेक्ट्स सिर्फ इसलिए खराब हो जाते हैं क्योंकि जल्दी है — जल्दी शूट, जल्दी एडिट, जल्दी रिलीज। Haryanvi Industry Reality यही है कि प्रोसेस को अभी भी बोझ समझा जाता है। अगर विज़न साफ हो, तो साधनों में भी कहानी बन जाती है। और अगर विज़न ही नहीं है, तो करोड़ों भी बेकार हैं।

ईमानदारी: इंडस्ट्री की सबसे अंडररेटेड क्वालिटी
पूरी बातचीत में बार-बार एक शब्द लौट कर आया — ईमानदारी। ना दिखावटी स्टारडम, ना फेक नेटवर्किंग। करणदीप के लिए स्टार वो नहीं है जिसके ज्यादा व्यू हैं, स्टार वो है जो:
- अपने काम के प्रति ईमानदार है
- स्ट्रगल में भी सीधा खड़ा रहता है
- और शीशे के सामने आंख मिलाकर खड़ा हो सकता है
आज की Haryanvi Industry Reality में यह सबसे मुश्किल चीज बन चुकी है।
हरियाणवी इंडस्ट्री बड़ी है, लेकिन अभी पूरी तरह तैयार नहीं
यह सच स्वीकार करना जरूरी है कि हरियाणवी इंडस्ट्री अब छोटी नहीं रही। गाने Bollywood तक पहुंच रहे हैं, लाइव शो हो रहे हैं, पैसा आ रहा है। लेकिन सवाल यह है — क्या इंडस्ट्री मानसिक रूप से तैयार है? अभी भी confusion है:
- देसी बनना है या पैन इंडिया?
- कला चाहिए या सिर्फ PR?
- फिल्म बनानी है या सिर्फ कंटेंट?
जब तक यह clarity नहीं आएगी, Haryanvi Industry अधूरी ही रहेगी।
रूट्स, सोच और क्रिएटिविटी का रिश्ता
यह बातचीत सिर्फ कैमरा और फिल्म तक सीमित नहीं रही। बात रूट्स तक गई — धर्म, संस्कार और सोच तक। एक डीओपी जो लाइट और फ्रेम को “रूह” कहता है, वो जिंदगी को भी उसी नजर से देखता है। क्रिएटिविटी हवा में पैदा नहीं होती। उसकी जड़ें होती हैं — परिवार में, जमीन में और अनुभव में।
कैमरे के पीछे खड़े लोग ही असली इंडस्ट्री हैं
जब यह पॉडकास्ट खत्म हुआ, तब एक बात बहुत साफ हो गई। हरियाणा में टैलेंट की कमी नहीं है। कमी है तो:
- प्रोसेस की समझ
- धैर्य की
- और कैमरे के पीछे खड़े लोगों के सम्मान की

Peddler Media का यह प्रयास सिर्फ एक पॉडकास्ट नहीं है। यह उन चेहरों को सामने लाने की कोशिश है जो कैमरे के पीछे रहकर पूरी इंडस्ट्री को आगे बढ़ाते हैं। और अगर यह सच्चाई ज्यादा लोगों तक पहुंच गई, तो इंडस्ट्री “रेडी” होने में ज्यादा वक्त नहीं लगाएगी।
निष्कर्ष: Haryanvi Industry Reality का असली चेहरा
जब मैं इस बातचीत को दोबारा सोचता हूं, तो एक बात साफ दिखती है: हरियाणा की मिट्टी थोड़ी खुरदरी है, लेकिन ईमानदार है। बोली में कड़वाहट लग सकती है, लेकिन उसमें प्यार छुपा है। और यही इस इंडस्ट्री की असली ताकत है। अगर इंडस्ट्री चमक से बाहर निकलकर सोच, प्रक्रिया और ईमानदारी को अपनाए — तो Haryanvi Industry Reality सिर्फ सवाल नहीं रहेगी, बल्कि एक मजबूत पहचान बन जाएगी।
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